CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है? जानिए लोकसभा और राज्यसभा में कितने सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है और विशेष बहुमत का पूरा गणित।

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विपक्षी दलों की ओर से उनके खिलाफ संसद में हटाने का प्रस्ताव लाने की तैयारी की खबरों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर CEC को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है और इसके लिए संसद में कितने सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है?
यह विवाद मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) और निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़ा है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। निर्वाचन आयोग ने दूसरी ओर कहा है कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
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CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के मामले में संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत हटाने का आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता होता है। दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं।
पहला चरण: सांसदों का नोटिस
हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संबंधित सदन में प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है।
- लोकसभा में नोटिस: कम से कम 100 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है।
- राज्यसभा में नोटिस: कम से कम 50 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है।
इसके बाद संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी नोटिस को स्वीकार या अस्वीकार करने पर निर्णय लेते हैं।
दूसरा चरण: जांच समिति
यदि नोटिस स्वीकार किया जाता है तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की जाती है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की इसी वैधानिक प्रक्रिया में समिति में सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश, किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होते हैं। समिति आरोपों की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट देती है।
तीसरा चरण: संसद में विशेष बहुमत
यदि जांच में आरोप सिद्ध माने जाते हैं, तो प्रस्ताव संसद के संबंधित सदन के सामने आता है। इसे पारित करने के लिए दो शर्तें पूरी करनी होती हैं।
पहली, प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत से पारित होना चाहिए। दूसरी, मौजूद और मतदान करने वाले सांसदों में से कम से कम दो-तिहाई सांसदों का समर्थन जरूरी होता है।
दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है और राष्ट्रपति के आदेश के बाद पद से हटाने की प्रक्रिया पूरी होती है।
लोकसभा में कितना है नंबर गेम?
वर्तमान लोकसभा की पार्टी स्थिति के मुताबिक बीजेपी के पास 240 सांसद हैं, जबकि कांग्रेस के पास 98 सांसद हैं। लोकसभा की कुल निर्धारित सदस्य संख्या 543 है।
इस हिसाब से केवल लोकसभा में किसी प्रस्ताव को कुल सदस्य संख्या के बहुमत की पहली शर्त पूरी करने के लिए कम से कम 272 सदस्यों का समर्थन चाहिए।
हालांकि केवल 272 का आंकड़ा पर्याप्त नहीं है। मतदान के समय मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों में भी कम से कम दो-तिहाई समर्थन आवश्यक होगा। इसलिए वास्तविक मतदान के दौरान आवश्यक संख्या इस बात पर भी निर्भर करेगी कि कितने सदस्य सदन में मौजूद होकर मतदान करते हैं।
यही वजह है कि CEC को हटाने की प्रक्रिया में सिर्फ प्रस्ताव के समर्थन में शुरुआती हस्ताक्षर जुटाना और अंतिम रूप से प्रस्ताव पारित कराना दो अलग-अलग चरण हैं।
राज्यसभा में क्या स्थिति है?
राज्यसभा में भी यही संवैधानिक सिद्धांत लागू होता है। यहां नोटिस देने के लिए कम से कम 50 सांसदों का समर्थन चाहिए। लेकिन नोटिस पर हस्ताक्षर कर देना अंतिम मतदान के समान नहीं है।
अंतिम चरण में प्रस्ताव को राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होगी। इसलिए राज्यसभा में भी अंतिम संख्या उस समय की सदस्य संख्या और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों पर निर्भर करेगी।
विपक्ष क्यों उठा रहा है ज्ञानेश कुमार को हटाने का मुद्दा?
विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कई आरोप लगाए हैं। इनमें चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और निर्वाचन आयोग के भीतर कथित असहमति से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने विभिन्न SIR-संबंधी फैसलों पर 10 महीने में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की। इसके बाद विपक्षी दलों ने CEC के खिलाफ कार्रवाई और हटाने की मांग तेज की।
हालांकि, यह आरोप राजनीतिक दलों और मीडिया रिपोर्टों में सामने आए दावे हैं। निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों के जवाब में कहा है कि उसके निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। इसलिए इस मामले में अलग-अलग पक्षों के दावों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
पहले भी दिया जा चुका है हटाने का नोटिस
ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग इससे पहले भी संसद में उठ चुकी है। अप्रैल 2026 में विपक्ष के 73 राज्यसभा सांसदों ने CEC को हटाने के लिए नया नोटिस दिया था। इसमें नौ आरोप शामिल किए गए थे।
इससे पहले मार्च 2026 में भी विपक्षी सांसदों ने दोनों सदनों में हटाने के प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश की थी। उस समय लोकसभा और राज्यसभा में अलग-अलग संख्या में सांसदों ने नोटिस का समर्थन किया था।
अब सितंबर 2026 में विपक्षी दल ताजा घटनाक्रम और SIR को लेकर सामने आई रिपोर्टों के बाद दोनों सदनों में नए नोटिस की तैयारी कर रहे हैं।
क्या सिर्फ सांसदों की संख्या से CEC को हटाया जा सकता है?
नहीं, यहां पूरा मामला केवल संख्या का नहीं है। शुरुआती नोटिस के लिए निर्धारित न्यूनतम सांसदों का समर्थन चाहिए, लेकिन उसके बाद पीठासीन अधिकारी का निर्णय, जांच समिति की प्रक्रिया और संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत—ये सभी महत्वपूर्ण चरण हैं।
लोकसभा में मौजूदा पार्टी स्थिति को देखें तो बीजेपी के पास 240 और कांग्रेस के पास 98 सांसद हैं। इसलिए किसी भी हटाने के प्रस्ताव के लिए केवल एक दल की संख्या पर्याप्त नहीं होगी। अंतिम मतदान में किस-किस दल के सांसद समर्थन करते हैं, कितने सांसद मौजूद रहते हैं और कितने मतदान करते हैं—इन सभी का असर पड़ेगा।
क्या है आगे की राह?
विपक्षी दलों की ओर से नए नोटिस की तैयारी के बीच अब आगे की प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों सदनों में नोटिस कब और किस संख्या में प्रस्तुत किए जाते हैं और संबंधित पीठासीन अधिकारी उन पर क्या निर्णय लेते हैं।
CEC को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था जानबूझकर कठिन रखी गई है। इसका उद्देश्य निर्वाचन आयोग के प्रमुख को सामान्य राजनीतिक दबाव के आधार पर हटाए जाने से सुरक्षा देना है। इसलिए किसी भी प्रस्ताव का संसद में पहुंचना और उसका अंतिम रूप से पारित होना कई संवैधानिक एवं संसदीय चरणों से होकर गुजरता है।
निष्कर्ष: ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक बहस जारी है, लेकिन किसी भी अंतिम परिणाम का निर्धारण केवल शुरुआती हस्ताक्षरों से नहीं होगा। नोटिस, जांच, दोनों सदनों में विशेष बहुमत और अंततः राष्ट्रपति के आदेश—पूरी प्रक्रिया के सभी चरण महत्वपूर्ण हैं।


